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बहरामपुर से अधीर और मालतीपुर से मौसम नूर, बालीगंज से रोहन मित्रा पर दांव
कोलकाता। बंगाल विधानसभा चुनाव के महासमर में अपनी खोई हुई सियासी जमीन वापस पाने के लिए कांग्रेस ने इस बार बड़ा और साहसिक दांव चला है। रविवार को कांग्रेस ने राज्य की 294 सीटों में से 284 उम्मीदवारों की अपनी बहुप्रतीक्षित सूची जारी कर दी। इस घोषणा के साथ ही पार्टी ने साफ कर दिया है कि वह करीब 20 साल बाद गठबंधन की बैसाखी छोड़कर एकला चलो की नीति पर चलते हुए तृणमूल और भाजपा के विरुद्ध त्रिकोणीय मुकाबले को धार देगी। पार्टी के इस कदम ने बंगाल की राजनीति में नए समीकरणों को जन्म दे दिया है।
कांग्रेस की इस सूची में दिग्गजों के नामों पर मुहर लगाकर नेतृत्व ने यह संकेत दिया है कि वह इस चुनाव को केवल औपचारिकता नहीं मान रही। प्रदेश कांग्रेस के कद्दावर नेता और पूर्व सांसद अधीर रंजन चौधरी को उनके गढ़ बहरामपुर से मैदान में उतारा गया है, जबकि मालतीपुर सीट से मौसम नूर को टिकट दिया गया है। एआईसीसी पर्यवेक्षक गुलाम अहमद मीर ने स्पष्ट किया कि पार्टी कुल 286 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जिनमें से 284 के नाम तय हो चुके हैं और शेष 8 सीटों पर अगले 24 घंटों में फैसला कर लिया जाएगा। उन्होंने हुंकार भरी कि इस बार कांग्रेस के तमाम हेवीवेट नेता चुनावी रणक्षेत्र में पसीना बहाते नजर आएंगे।
पार्टी ने बालीगंज से दिवांगत नेता सौमेन मित्रा के पूत्र रोहन मित्रा को जबकि जोड़ासांकों से दीपक सिंह, चौरंगी से मानस सरकार, हावड़ा उत्तर से ओम प्रकाश जयसवाल, भवानीपुर से प्रदीप प्रसाद को मैदान में उतारा हैं। कांग्रेस का यह फैसला विशेष रूप से मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर जैसे उसके पारंपरिक गढ़ों में हलचल पैदा करने वाला है। पिछले कई चुनावों से वाम दलों के साथ गठबंधन में रहने वाली कांग्रेस ने इस बार अकेले लडऩे का जोखिम उठाकर अपने कार्यकर्ताओं में नया जोश भर दिया है।
पार्टी सूत्रों के अनुसार, कार्यकर्ताओं को तत्काल प्रभाव से दीवार लेखन और जमीनी स्तर पर जनसंपर्क तेज करने के निर्देश दिए गए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कांग्रेस की यह सक्रियता कई सीटों पर मतों का ध्रुवीकरण रोक सकती है, जिसका सीधा असर तृणमूल और भाजपा के चुनावी गणित पर पडऩा तय है। राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि कांग्रेस इस चुनाव को संगठन के पुनर्जीवन के अवसर के रूप में देख रही है। जहां तृणमूल और भाजपा पहले ही अपने उम्मीदवारों की सूची जारी कर मैदान में बढ़त बनाने की कोशिश कर रहे थे, वहीं कांग्रेस की इस विशाल सूची ने मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि दो दशकों बाद अकेले चुनावी समर में उतरी कांग्रेस बंगाल की सत्ता के संघर्ष में कितनी प्रभावी सिद्ध होती है और क्या वह अपने पुराने दुर्ग को बचाने में सफल हो पाएगी।